Thursday, September 20, 2018

गेहरी काली रात

गेहरी काली रात हुई है
और हम अंधेरे से
छा रहे है दरिया मैं
और डर की बरसात हुई है

चमकती बिजली में
चौंध जाएं आंखे जो
प्रेत मन में काल का
भर रहा है द्वेष जो
बहते आँसू की फरियाद हो रही है
और हम जो सर झुकाये खड़े है
शीशे में अब
खुद से मेरी बात हुई है
गेहरी काली रात हुई है

तार तार होगया है
मन में अब मेरा ये क्रोध
समझ लूंगा में अब ये
किसका और क्यों है ये दोष
रोशनी सी आग बढ़ रही है
आफताब की चांदनी अब सीमट रही है

गेहरी काली रात ढल रही है
गेहरी काली रात ढल रही है




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गेहरी काली रात हुई है और हम अंधेरे से छा रहे है दरिया मैं और डर की बरसात हुई है चमकती बिजली में चौंध जाएं आंखे जो प्रेत मन में काल क...