ये मिली है तो गम ले के जी रहे हो
चार दिन की अगर ज़िन्दगी है
और दो पल की मुश्किलें
ज़िन्दगी मिली ही न होती
तो क्या करते।
जो हर छोटी बात पर रूठते हो
जंग की घड़ी में टूटते हो
हार ही माननी होती है
तो क्यों बारम बार
कोशिश किया करते हो।
क्योंकि तुम भी जानते हो
कोई भी तुम्हे नही है तोड़ सकता
तो क्यों जीत की सडक पे आके
मात के गढ्ढो को घूरते हो।
ओस की बूंदो की तरह
डर भी गायब हो जाता है
तो फिर तुम उस बून्द को
कैसे कैद कर सकते हो।
राह आसान होती
तो वो राह नही मैदान होता
उस राह के तुम ही मुसाफिर हो
ये मान के कदम तोह बढ़ा कर के देखो।
जानते हो बचपन से हार जीत का खेल
जो जीता वो सिकन्दर जो हारा वो फैल
लेकिन हारा तो सिकन्दर भी था
और जिसे मिला नोबेल पुरस्कार
वो आइंस्टीन भी हुआ था फैल।
चार दिन की अगर ज़िन्दगी है
और दो पल की मुश्किलें
ज़िन्दगी मिली ही न होती
तो क्या करते।
जो हर छोटी बात पर रूठते हो
जंग की घड़ी में टूटते हो
हार ही माननी होती है
तो क्यों बारम बार
कोशिश किया करते हो।
क्योंकि तुम भी जानते हो
कोई भी तुम्हे नही है तोड़ सकता
तो क्यों जीत की सडक पे आके
मात के गढ्ढो को घूरते हो।
ओस की बूंदो की तरह
डर भी गायब हो जाता है
तो फिर तुम उस बून्द को
कैसे कैद कर सकते हो।
राह आसान होती
तो वो राह नही मैदान होता
उस राह के तुम ही मुसाफिर हो
ये मान के कदम तोह बढ़ा कर के देखो।
जानते हो बचपन से हार जीत का खेल
जो जीता वो सिकन्दर जो हारा वो फैल
लेकिन हारा तो सिकन्दर भी था
और जिसे मिला नोबेल पुरस्कार
वो आइंस्टीन भी हुआ था फैल।
Love the lines of second stanza ❤
ReplyDeleteThank you 😊
DeleteGOod job buddy����
ReplyDeleteThank you
Delete❤❤❤
Delete😋
Deletenic one
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