Tuesday, June 12, 2018

ये मिली है तो गम ले के जी रहे हो
चार दिन की अगर ज़िन्दगी है
और दो पल की मुश्किलें
ज़िन्दगी मिली ही न होती
तो क्या करते।

जो हर छोटी बात पर रूठते हो
जंग की घड़ी में टूटते हो
हार ही माननी होती है
तो क्यों बारम बार
कोशिश किया करते हो।

क्योंकि तुम भी जानते हो
कोई भी तुम्हे नही है तोड़ सकता
तो क्यों जीत की सडक पे आके
मात के गढ्ढो को घूरते हो।

ओस की बूंदो की तरह
डर भी गायब हो जाता है
तो फिर तुम उस बून्द को
कैसे कैद कर सकते हो।

राह आसान होती
तो वो राह नही मैदान होता
उस राह के तुम ही मुसाफिर हो
ये मान के कदम तोह बढ़ा कर के देखो।

जानते हो बचपन से हार जीत का खेल
जो जीता वो सिकन्दर जो हारा वो फैल
लेकिन हारा तो सिकन्दर भी था
और जिसे मिला नोबेल पुरस्कार
वो आइंस्टीन भी हुआ था फैल।

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