Tuesday, June 19, 2018

गीत -संगीत

उस साज़ के साथ
अलग ही है बात
मुझे खुश कर देता है
चाहे कितनी ही काली हो रात

अपनी धून में उलझा कर
मेरे चेहरे पर मुस्कान ला कर
मैं भी उस मोर की तरह 
मचल जाता हूं
जिसे बारीश से होता है लगाव

खो कर उन अल्फाज़ो में
कभी खुद भी कुछ लिख देता हूं
और किसी तड़कती धून पर 
बेफिकर नच लेता हूं
गीत से संगीत से
मेरे हमराही मीत से
थोड़ा जुदा हो जाऊं
ज़िन्दगी की घिसी पिटी रीत से

कुछ देर तो अम्बर की धुन को मेहसूस कर
कह दु ये ज़माने से
ये दुनिया एक अफसाना है
हमे बस इसे सुनते जाना है

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