Thursday, September 20, 2018

गेहरी काली रात

गेहरी काली रात हुई है
और हम अंधेरे से
छा रहे है दरिया मैं
और डर की बरसात हुई है

चमकती बिजली में
चौंध जाएं आंखे जो
प्रेत मन में काल का
भर रहा है द्वेष जो
बहते आँसू की फरियाद हो रही है
और हम जो सर झुकाये खड़े है
शीशे में अब
खुद से मेरी बात हुई है
गेहरी काली रात हुई है

तार तार होगया है
मन में अब मेरा ये क्रोध
समझ लूंगा में अब ये
किसका और क्यों है ये दोष
रोशनी सी आग बढ़ रही है
आफताब की चांदनी अब सीमट रही है

गेहरी काली रात ढल रही है
गेहरी काली रात ढल रही है




Monday, July 23, 2018

चंग छन -1

मिज़ाज़ बदल इरादे नही
बेवजह चीखने से
ये सर्द सन्नाटे सही

दफन ना कर अच्छाई को अपनी
विदा करना ही है तो
गीले शिकवे और बुराई को कर,
हर दफा नही होता वो जो तू चाहे
लेकिन मत हावी होने दे 
इस ग़ुस्से को खुद पर।

झुकी हुई नज़रे भी उतनी ही ज़रूरी है
जितनी तनी हुई छाती

तेरी बातो से तेरा जुनून दिखना चाहिए
गुरूर नही
तेरा डर मिटता है जहा
तेरी हिम्मत जन्म लेती है वहीं।।

Tuesday, July 10, 2018

डर का गणित

डर डरावना है
हमरी कल्पनाओ का
ये टूटा खिलौना है

बचपन से हमारे साथ
आंख मिचौली है खेलता
जहा हमारी हिम्मत काँपती
वहा ये दीमक की तरह है फैलता

ये है कूकर की सिटी जैसा
ये हमें चेताता है कि 
तेरी तैयारी शायद कम है
लेकिन BOSS तू दुनिया बदल दे
इतना तुझमें दम है

बीजल कड़क रही हो तो
सहमे मत
आंधी के डर से
मत कर बंद हिम्मत के पट

ललकार उस डर को
के मैं इतना कमजोर नही

अब तू देख तेरा फायदा मैं कैसे उठाता हूं
तुझे ही ढाल बना के हर जंग जीत के दिखता हूं।



Thursday, June 21, 2018

मंज़िल तेरी

जब मैं बैठा तन्हा सोच रहा था
हमे क्यों नही मिलता जो हम चाहते है
और सोचा ऐसा होता है क्यों

तब एक अनसुना एहसास फरमाया
तू दौड़ता है तभी, जब दौड़ होती है लगी
कभी भाग के तो देख खुद के लिये

तू चाहता है वो जो चाह नही है तेरी
बस भेड़ो की तरह है चाहा जा रहा
पहले पेहचान तेरी खूबी है क्या
वो जो ख्वाइश तेरे मैन में है
तुझमे आके डूबी है क्या

अरे सपने हो जायंगे पूरे 
पेहले पता कर
क्या वो सपने है तेरे
कुछ भी नही है मुश्किल इस जहा में
न है कोई खामी तुझमे

तू वो है जो चाँद पे है चल सकता
अपनी कलम से दुनिया भर में बवाल है मचा सकता
झांक के अपने अंदर देख ज़रा 
तू मिट्टी को सोने में है बदल सकता




Tuesday, June 19, 2018

गीत -संगीत

उस साज़ के साथ
अलग ही है बात
मुझे खुश कर देता है
चाहे कितनी ही काली हो रात

अपनी धून में उलझा कर
मेरे चेहरे पर मुस्कान ला कर
मैं भी उस मोर की तरह 
मचल जाता हूं
जिसे बारीश से होता है लगाव

खो कर उन अल्फाज़ो में
कभी खुद भी कुछ लिख देता हूं
और किसी तड़कती धून पर 
बेफिकर नच लेता हूं
गीत से संगीत से
मेरे हमराही मीत से
थोड़ा जुदा हो जाऊं
ज़िन्दगी की घिसी पिटी रीत से

कुछ देर तो अम्बर की धुन को मेहसूस कर
कह दु ये ज़माने से
ये दुनिया एक अफसाना है
हमे बस इसे सुनते जाना है

Saturday, June 16, 2018

एक नन्हा पौधा

एक नन्हा पौधा पनप रहा था
जल बून्द बन बरस रहा था
उजाला तो था लेकिन कुछ ज़्यादा ही गरम हवा
एक प्यारा पंछी झुलस गया था

हवा ने अपना रूख ऐसा मोड़ा
एक बूढ़ा वृक्ष जो लड़ रहा था अपनी ही जड़ो से
वो कुछ देर में ज़मीन पर ढेर पड़ा था

उस नन्हे पौधे ने जब ये सब देखा
उसका मन दहल उठा
अभी आइ ही थी दो पल कोपल
सहमा पौधा डर से मरहूम हो गया

तभी एक चिड़िया उछल पड़ी
अगर हिम्मत रखता तो उडान भरता बड़ी
दो दिन में तूफान थम गया
बौछार से नन्हा बीज फिर पनप गया


Thursday, June 14, 2018

मेरे तरकश में कई तीर है

मेरे तरकश में कई तीर है
कुछ तीरो में साहस की चमक है
कुछ तीरो में कमज़ोरियों की जंग
कुछ तीर मेरे हौसलो की तरह पक्के है
कुछ तीर मेरे निशाने से भटके है

हर तीर मैने मेहनत की आँखों से

सुखी लकड़ी देख कर चुना है
धातु को रगड़ कर
आग की लपटों में भूना है
बार बार उसे ठंडा कर फिर पकाया है
ताकि उनमे कोई कमी न रहे
लेकिन मेरे डर की दीमक ने
कुछ तीर खोखले कर दिए है
जो धार कोई पत्थर ना मोड़ पाए
वो मैने खुद कमज़ोर कर दिए है

मैं खुद भूल जाता हूं 

अगर निशाना मछ्ली की आँख है
तो मेरे बाज़ू में भी तो दम हो
सिर्फ मेरे तीर अछे होने से फर्क नहीं पड़ता
अगर चलाना ना आये तो तोप भी किस काम की

अगर चूक जाए निशाना तो दोष तिरो का नही

मन ही बावला हो तो वो दिमाग क्या करे

अब पकड़ के बाण अपने सपनो का
लगा के बाज़ी अपनी खूबी से 
पूरे ज़ोर ओर विश्वास से तीर छोडूंगा
और जीत की चादर अपने बदन पे ओढुंगा

एकाग्रता अनुशासन और मन मे धीर है
गर्व है के मेरे इरादे वीर है
मेरे तरकश में कई तीर है
मेरे तरकश में कई तीर है।।


Tuesday, June 12, 2018

ये मिली है तो गम ले के जी रहे हो
चार दिन की अगर ज़िन्दगी है
और दो पल की मुश्किलें
ज़िन्दगी मिली ही न होती
तो क्या करते।

जो हर छोटी बात पर रूठते हो
जंग की घड़ी में टूटते हो
हार ही माननी होती है
तो क्यों बारम बार
कोशिश किया करते हो।

क्योंकि तुम भी जानते हो
कोई भी तुम्हे नही है तोड़ सकता
तो क्यों जीत की सडक पे आके
मात के गढ्ढो को घूरते हो।

ओस की बूंदो की तरह
डर भी गायब हो जाता है
तो फिर तुम उस बून्द को
कैसे कैद कर सकते हो।

राह आसान होती
तो वो राह नही मैदान होता
उस राह के तुम ही मुसाफिर हो
ये मान के कदम तोह बढ़ा कर के देखो।

जानते हो बचपन से हार जीत का खेल
जो जीता वो सिकन्दर जो हारा वो फैल
लेकिन हारा तो सिकन्दर भी था
और जिसे मिला नोबेल पुरस्कार
वो आइंस्टीन भी हुआ था फैल।

गेहरी काली रात

गेहरी काली रात हुई है और हम अंधेरे से छा रहे है दरिया मैं और डर की बरसात हुई है चमकती बिजली में चौंध जाएं आंखे जो प्रेत मन में काल क...