Thursday, June 21, 2018

मंज़िल तेरी

जब मैं बैठा तन्हा सोच रहा था
हमे क्यों नही मिलता जो हम चाहते है
और सोचा ऐसा होता है क्यों

तब एक अनसुना एहसास फरमाया
तू दौड़ता है तभी, जब दौड़ होती है लगी
कभी भाग के तो देख खुद के लिये

तू चाहता है वो जो चाह नही है तेरी
बस भेड़ो की तरह है चाहा जा रहा
पहले पेहचान तेरी खूबी है क्या
वो जो ख्वाइश तेरे मैन में है
तुझमे आके डूबी है क्या

अरे सपने हो जायंगे पूरे 
पेहले पता कर
क्या वो सपने है तेरे
कुछ भी नही है मुश्किल इस जहा में
न है कोई खामी तुझमे

तू वो है जो चाँद पे है चल सकता
अपनी कलम से दुनिया भर में बवाल है मचा सकता
झांक के अपने अंदर देख ज़रा 
तू मिट्टी को सोने में है बदल सकता




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